काला जादू क्या है |
काला जादू एक ऐसी बुरी शक्ति या बुरी ऊर्जा जो किसी पर बुरा प्रभाव डालती है यह एक प्रकार नकारात्मक दृष्टि है और इस नकारात्मक दृष्टि से बचाने के लिए वास्तुशास्त्र में सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ने के लिए प्रावधान है वास्तुशास्त्र के अनुसार ये सकारात्मक ऊर्जा कला जादू और नकारत्मक ऊर्जा का प्रभाव काम करती है सकारत्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए वास्तुशास्त्र मे कई प्रकार के प्रावधान भी इंगित है जैसे उदहारण के लिए किसी भी प्रकार के वास्तु दोष को दूर करने के लिए घर की छत या छाजे पर उत्तर पूर्व दिशा में पांच तुलसी के पौधे लगाना चाहिए। अगर पांच नहीं लगा सकते तो कम से कम एक तुलसी का पौधा इस दिशा में जरुर लगाएं। इससे घर में आने वाले नकारात्मक प्रभाव में कमी आती है। वास्तुविज्ञान और वास्तुशास्त्र में विस्तार से बताया गया है बाहर से घर में आने वाले लोग भी कई बार कोई नकारात्मक उर्जा को अपने संग लेकर आते हैं। और वास्तु विज्ञानं के आधार पर जिनके घर के प्रवेश द्वार पर तुलसी का पौधा होता है उनके घर में इस तरह के नकारात्मक उर्जा का प्रवेश नहीं हो पाता है ।

जानिए क्या है काला जादू? ये संकेत बताते हैं काला जादू हुआ है या नहीं
काला जादू और वूडू का नाम सुनकर लोग डर जाते हैं क्योंकि इसे काली शक्तियों का प्रतीक माना जता है। लेकिन सच यह है कि काला जादू कुछ नहीं होता है। यह एक प्रकार का मैजिक होता है। लोग मैजिक का प्रयोग व्यक्तिगत लाभ और दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए करने लगे तो इसका नाम काला जादू हो गया। काला जादू के अंतर्गत मूठकर्णी विद्या, वशीकरण, स्तंभन, मारण, भूत-प्रेत टोने और टोटके आदि आते हैं। इसे तांत्रिक विद्या भी कहा जाता है। भारत में बौद्ध धर्म के ब्रजयान समुदाय से इसका विस्तार माना जाता है।
कुंडली में कुछ ग्रह दोष होने के कारण जातक पर काला जादू असर करने लगता है। यदि कुंडली में सूर्य, चंद्र, शनि और मंगल विशेष भावों में राहु-केतु से पीड़ित होते हैं, तभी नकारात्मक ऊर्जा का असर होता है। ज्योतिष में बताया गया है कि सूर्य ग्रहण वाले दिन काले जादू का असर अधिक होता है, क्योंकि इस दिन राशियों की स्थिति में भारी बदलाव होता है।
पुतले का प्रयोग
काले जादू का ज्योतिषीय योग
काला जादू का नाम आते ही मन में सबसे पहले बंगाल का ख्याल आता है। पर ऐसा नहीं है। भारत से भी ज्यादा काला जादू अफ्रीका में किया जाता है। यहां इसे वूडू नाम से जाना जाता है। इस प्रक्रिया में एक गुड़िया जैसे दिखने वाले पुतले का प्रयोग किया जाता है। इसे खाने की चीजों जैसे बेसन, उड़द की दाल और आटे से भी बनाया जाता है। उसके बाद इसमें मंत्र फूंककर जान डाली जाती है और फिर जिस पर काला जादू किया जाता है उसका नाम लेकर इस पुतले को जागृत किया जाता है।
ऐसे हुई शुरुआत
इसकी शुरुआत भी अफ्रीका से मानी जाती है। सन 1847 में एरजूली नामक एक देवी पेड़ पर प्रकट हुईं। उसे प्यार और सुंदरता की देवी माना जाता था। उसने अपनी शक्तियों से यहां के लोगों की बीमारियां दूर कर दीं। उनकी सारी परेशानियां खत्म कर दीं। चर्च के पादरियों को यह सब पसंद नहीं आया। उन्होंने इसे ईशनिंदा कहते हुए उस पेड़ के तने को ही नष्ट करवा दिया। लोग यहां देवी की मूर्ति बनवाकर उनकी पूजा करने लगे।
वूडू बन गया काला जादू
वूडू का प्रयोग लोगों के रोग और परेशानियां दूर करने के लिए किया जाता था। मगर जब इसका गलत रूप से इस्तेमाल होने लगा तो यह काला जादू बन गया। इसमें मर चुके लोगों की प्रेतात्मा को किसी दूसरे के शरीर में बुलवाकर अपने स्वार्थ पूरे किए जाते हैं।
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